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परिचय - २ - वकालत (1938-1958)

श्री शिवदयाल ने सन्‌ १९३८ में अपने पूज्य पिताजी के चरणों में बैठ कर वकालत आरम्भ की । सन्‌ १९३९ में इनके पिताजी ब्रह्मलीन हो गये । सन्‌ १९५८ में हाई कोर्ट जज नियुक्त होने तक इन्होंने वकालत की । इन वर्षों में वह :

  1. पार्ट टाइम प्रोफ़ेसर ऑफ लॉ १९४८ से १९५८ तक रहे ।
  2. डेप्युटि गवर्नमेंट एडवोकेट १९४९ से १९५८ तक रहे ।
  3. मध्य भारत विधान सभा के सदस्य १९४८ से १९४९ तक रहे ।
    संविधान बनने पर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के कारण उन्होंने त्याग पत्र दिया । उन दो वर्षों में भी इन्होंने अपने राजनैतिक जीवन को केवल विधि और शिक्षा के क्षेत्र में सीमित रखा । स्वतन्त्र सदस्य रहते हुए सभी राजनैतिक दलों में लोकप्रिय रहे ।
  4. रोटरी क्लब ग्वालियर के सन्‌ १९४६ से सदस्य, फिर सचिव, फिर उपाध्यक्ष रहकर १९५३-१९५४ में अध्यक्ष रहे ।
  5. फ्रीमेसन लॉज ग्वालियर के राइट वर्शिपफुल मास्टर १९५२-१९५३ में रहे ।
  6. ग्वालियर म्युनिसपैलिटी के सदस्य और वाइस प्रेसीडेन्ट १९४२ से १९४६ तक रहे .

परिचय - ४ - रिटायरमेंट के बाद (1978-2003)

रिटायर होते ही स्वामी अखण्डानन्द जी सरस्वती के आदेश पर पुनः सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने लगे और अन्त तक करते रहे । अन्तिम केस १८ अगस्त २००३ को किया.

पुस्तकें लिखना व संकलन कर प्रकाशित करना उनके जीवन का अभूतपूर्व अंग था । उनकी पुस्तकें विधि सम्बन्धी, धार्मिक एवं विद्यार्थियों के लिये थीं । तीनों विषयों पर उनके अनेक प्रकाशन हुए ।

१ अक्तूबर २००३ को ब्रह्ममुहूर्त में उन्होंने शरीर त्याग दिया और उनकी पुण्य आत्मा श्री रामजी के चरणों में लीन हो गयी .